अमृतसरकपूरथला / फगवाड़ागुरदासपुरचंडीगढ़जालंधरपंजाबपटियालाफिरोज़पुरराजनीतिराष्ट्रीयलुधियानाहोशियारपुर

पैसा बोलता है – चुनावी मौसम में सैटिंग का दौर – कहां गये महिला पर अभद्र टिप्पणी का विरोध करने वाले ? – पैसा फैंको ओर बैंड-बाजा-बारात की सुविधा लो

लीडरी  का बूखार जिसे हो जाता है वो खुद को किंग समझने लग जाता है। व्यापारी से भगत से धार्मिक गायक बन कर अखबारो में सुर्खीया बटोर लेने से चेयरमैनी तक पहुंच बनाने वाले को उसके ऊंचे सपने ही ले डूबेंगे। कहावत है कि जिसकी जन्म कुंडली न हो उसे चुनावों मे खड़े कर दो विरोधी उसकी पूरी कुंडली तैयार कर देगें। ऐसे ही झमेले में फसे जालंधर के एक उम्मीदवार की उम्मीदो पर उसकी महिलाओ के प्रति अभद्र टिप्पणी ने झाड़ू फेर कर रख दिया व उसके विरोध में उठे स्वर व मुर्दावाद की नारेबाजी उसे कई लाखो में खरीद कर शांत करवानी पड़ी व अब पेड महिलाओ का प्रबंध कर पैसे के बल पर प्रचार करबाना पड़ रहा है कि हम महिला शक्ती का सम्मान करते है। लोगो के खौफ कारण अब बाऊंसर भी रखने पड़ रहे है। अब देखना यह है कि नामांकन प्रक्रिया दौरान भीड़ एकत्रित करने के लिए वह कितना पैसा बहाते है। यह भी सोशल मीडिया पर प्रचार होना शुरू हुआ है कि एक उम्मीदवार ने सूरत के व्यापारियो सहित एक ऐसे कैटर का बिल भी नही दिया जिसने उसके बेटे की शादी पर कैटरिंग की थी। 

चुनावी मौसम आते ही उम्मीदवारो पास पहुंचे दलाल

पैसा फैंको ओर बैंड-बाजा-बारात की सुविधा लो

डंडा – झंडा – भीड़  व न्यूज तक के लिए सैटिंग शुरू हो चुकी है व इस दौर में अच्छी सुविधाएं देने वाले खुद की सैटिंग के साथ साथ अपने साथियो की भी सैटिंग करबा उनसे कमीशन खा रहे है।हर तरह के काम के लिए फिक्स फीस तय की जा रही है।चुनावी प्रचार दौरान बहूत सी लेबर सुबह-शाम अलग अलग झंडे लहराती आम जनता के रू-ब-रू होगी। 

50 करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत की प्रचार सामग्री दुकानों-गोदामों में ही फंसी

बीजेपी का कमल वाला झंड़ा हो या फिर समाजवादी पार्टी की लाल टोपी। बहुजन समाज पार्टी का बिल्लें हो या कांग्रेस का तीन रंगों वाला फटका। मोदी, योगी, अखिलेश और मायावती के फोटो वाला कार फ्लैग हो या भगवा कपड़े। चुनाव प्रचार से जुड़ी यह तमाम चीजें चुनावी मौसम होने के बावजूद प्रचार सामग्री बेचने वाली दुकानों में ही पड़ा हुआ है। क्योंकि चुनाव आयोग ने सभी चुनावी राज्यों में रैली, पदयात्रा, धरना जैसी तमाम गतिविधियों पर रोक लगा रखी है। इस रोक के चलते यूपी में चुनावी सीजन के बावजूद प्रचार सामग्री की दुकानों पर लॉकडाउन का लग गया है।

चुनाव के उत्सव को आकर्षक बनाने में प्रचार सामग्री की अपनी भूमिका होती है। नामांकन दाखिल करने से लेकर रैली, सभा, धरना जैसी तमाम चुनावी गतिविधियों में पार्टियों के रंग-बिरंगे झंडे, बैनर माहौल में चुनावी रंग घोलते हैं। लेकिन इस बार कोरोना के चलते रैलियों पर लगी पाबंदी ने इस रंग को फीका कर दिया है। कारोबारियों को कोरोना काल की मंदी से उबरने के लिए विधानसभा चुनाव का इंतजार था।

चुनाव की तिथि घोषित होने के बाद आचार संहिता लागू होने से प्रचार सामग्री का रहा सहा धंधा भी ठंडा हो गया। बंदरिया बाग रेलवे कॉलोनी स्थित सपा कार्यालय के बाहर सड़क के दोनों तरफ चुनाव प्रचार सामग्री की बेचने की 32 दुकानें लगी हैं। इनमें समाजवादी पार्टी की चुनाव प्रचार सामग्री ही बिकती है। चुनावी प्रचार सामग्री बेचने वाले दुकानदार सालभर पहले ही चुनावी तापमान भांप लेते हैं। इसीलिए उन्होंने चुनावों में मुनाफा कमाने की आस में सालभर पहले ही 20 करोड़ रुपए से ज्यादा की चुनावी सामग्री खरीदकर गोदाम भर लिए थे।

30 करोड़ की प्रचार सामग्री दारूल सफा की दुकानों में फंसी

विधानसभा के सामने भाजपा कार्यालय के पास दारूल सफा में 57 दुकानों पर चुनाव से जुडी सामग्री की दुकानें हैं। इनमें से दो दुकानें भाजपा कार्यालय की बाउंड्रीवॉल के भीतर ही लगी हैं। कांग्रेस कार्यालय परिसर में चुनाव प्रचार सामग्री बेचने की महज एक ही दुकान हैं। वहीं बहुजन समाज पार्टी कार्यालय के पास वाले फ्लाईओवर के नीचे भी मात्र एक ही दुकान है जिस पर बसपा की प्रचार सामग्री बेची जा रही है। प्रचार सामग्री विक्रेताअखिलेश सक्सेना बताते हैं कि इन सभी दुकानों में 25 लाख से ढ़ाई करोड़ रुपए तक का सामान भरा हुआ है। सभी दुकानों में कुल 30 करोड़ से ज्यादा की प्रचार सामग्री बिकने के लिए तैयार है लेकिन रैलियों पर रोक के चलते बिक्री भी थमी सी गई है।

दुकानदार बोले कमाई का यही मौका था

कोरोना संक्रमण से पहले जब भी विधानसभा व लोकसभा चुनाव हुए तब प्रचार सामग्री की दुकानों पर भीड़ उमड़ती थी। सभी दलों के नेता-कार्यकर्ता चुनाव सामग्री खरीदते थे। दारुल सफा में चुनाव प्रचार सामग्री बेचने वाले रघुराज पाल के मुताबिक इस बार के विधानसभा चुनावों में रोक लगने से पहले तक हर दुकान से रोजाना डेढ़ से दो लाख रुपये का माल बिक जाता था। चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद यह बिक्री दोगुना होने की उम्मीद थी लेकिन आयोग की एक घोषणा ने हमारा काम ही बंद कर दिया है।

प्रचार सामग्री बेचने वाले रवि कुमार मेहता और आशीष कुमार बताते हैं कि गठबंधन, सत्ता पक्ष के अलावा क्षेत्रीय दलों के झंडे, टोपी, पटका व बिल्ला आदि माल एडवांस में मंगाया था लेकिन चुनावी रैलियों पर पाबंदी से बाजार को झटका लग गया। चुनाव की तिथि घोषित होने से पहले तक कारों में पार्टियों के झंडे लगवाने की डिमांड थी। लेकिन अब हम दिनभर खाली बैठे रहते हैं। चाय-पानी का खर्चा निकलना भी मुश्किल हो रहा है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

You cannot copy content of this page