विचारधारा बनाम अवसरवाद : चुनावों की आहट आते ही मौकापरस्ती की राजनीति दिखने लगी
मतदाता को ऐसे गैर जिम्मेदार राजनीतिक दल और निष्ठाविहिन नेता से कोई आस नहीं रखनी चाहिए। उनकी पहचान हो और अगर मतदाता अपने वोट की ताकत से इन लोगों को सबक सिखाना शुरू कर देगा तो जल्द ही अवसरवाद का यह दुष्चक्र खत्म हो जाएगा।

इंसानी जीवन के सफेद और स्याह पहलुओं के बीच भेद बताने के लिए हमारे मनीषियों ने कुछ नियम और प्रविधान तय किए। ये नियम सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्षों पर आधारित थे। कालांतर में इन्हीं विचारों को लोग मानते गए और विचारधाराएं प्रस्फुटित हुईं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में शिरकत कर रहे हमारे तमाम बड़े-छोटे, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल इन विचारधाराओं से ओत-प्रोत हैं।हर नागरिक की भी अपनी एक विचारधारा होती है जिसके आधार पर समान वैचारिकी के चलते वह उस दल से जुड़ता है। लेकिन इन दिनों मतदाता हैरत में है। उसे समझ नहीं आ रहा है कि आखिर कल तक जो राजनेता एक दूसरे दल के विचारों से जुड़े थे, वे रातोंरात कैसे एक विपरीत विचारधारा से जुड़े दल के खेमे में सहज हो जाते हैं। आया राम गया राम की संस्कृति तेज हो गई है। टिकट कट रहा हो, या फिर तथाकथित मौसम विज्ञानी की तरह भविष्य की आहट देख ले रहे ये माननीय तुरंत पाला बदल रहे हैं।ये नेता तो अपना हित साध रहे हैं, लेकिन इस कुसंस्कृति को पुष्पित- पल्लवित करने का श्रेय किसको जाता है? मतदाता भौचक है। वो सोच रहा है कि जिसकी अपनी कोई विचारधारा नहीं है, जिसकी अपनी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, उसके लिए मतदाता और विधानसभा क्षेत्र की क्या अहमियत? कल को मौका मिलेगा तो किसी तीसरी पार्टी से किसी चौथी विधानसभा चुनाव क्षेत्र को अपनी कार्यस्थली बना लेगा। मतदाता अपने मत के प्रति जवाबदेही चाहता है, खासकर उन राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से जो विचारधारा आधारित होने का खम ठोंकते हैं। आखिर ऐसे बिन पेंदी के लोटे दलबदलुओं को प्रश्रय देकर लोकतंत्र की गरिमा में क्षरण के दोषी तो वे भी हैं। एक ही अहर्ता जिताऊ उम्मीदवार के चलते उनकी सारी खामियां और अपनी नैतिकता ताक पर रख देना आखिर कहां तक सही है। चुनावों की आहट आते ही अवसरवाद की राजनीति दिखने लगी। विचारधारा गौण हो गई है। अपना हित सधता, भाड़ में जाए जनता वाली यह मानसिकता दिखाते तमाम जनप्रतिनिधियों पर एक नजर…
पंजाब
राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी: कांग्रेस में साढ़े चार साल तक कैबिनेट मंत्री रहे सोढ़ी भाजपा में गए। राणा कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी मंत्री थे।
फतेहजंग बाजवा: कादियां से विधायक कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी थे। कांग्रेस के राज्य सभा सदस्य प्रताप सिंह बाजवा के सगे भाई हैं। अब भाजपा से जुड़ गए हैं।
बलविंदर लाडी: श्री हरगोबिंदपुर से विधायक कांग्रेस से टिकट कटने की आशंका में भाजपा का रुख किया। छह दिन बाद ही कांग्रेस में लौटे। इस उठापटक के बाद भी उनका टिकट कट गया है।
डा. हरजोत कमल: मोगा से 2017 में चुनाव जीते डा. हरजोत सिद्धू के काफी करीब माने जाते थे। लेकिन कांग्रेस ने मालविका सूद को मोगा से टिकट दिया तो डा. हरजोत भाजपा में चले गए।
निमिशा मेहता : कांग्रेस से 2017 में गढ़शंकर सीट से चुनाव में उतरी थीं। इस बार टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया।
अमनदीप सिंह आशु बांगड़: आम आदमी पार्टी ने फिरोजपुर देहाती से टिकट दिया था, लेकिन उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस ने फिरोजपुर देहाती से ही चुनाव लड़वाने की घोषणा की है।



