कानून वापसी का पंजाब पॉलिटिक्स पर असर:BJP बन सकती है गेमचेंजर, समझिए 117 में से 77 सीटों पर क्या असर पड़ेगा-बैकफुट पर शिरोमणि अकाली दल बादल:नए कृषि कानूनों पर टूटे गठजोड़ के बाद पंजाब में कैप्टन लेंगे बादल की जगह, ग्रामीण वोट बैंक संभालेंगे

पंजाब में करतारपुर कॉरिडोर खोलने के बाद भाजपा ने बड़ा चुनावी मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के विरोध की वजह बने तीनों कृषि सुधार कानून रद्द करने की घोषणा कर दी। पंजाब में साढ़े 3 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ये फैसला भाजपा को फल दे सकता है।
अहम यह भी है कि PM मोदी ने फैसले के लिए गुरु पर्व का दिन चुना। जिस वक्त पूरा सिख समाज पहले पातशाही गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व की खुशियां मना रहा था, उसी बीच यह ऐलान होने से भाजपा ने सिख समाज से भावनात्मक रूप से जुड़ने की कोशिश की है। जानिए फैसले से भाजपा को क्या फायदा होगा…
1. पंजाब में मुश्किल राह आसान होगी
पंजाब में भाजपा के लिए कृषि कानूनों की वजह से रास्ता मुश्किल हो गया था। करीब 14 महीने से किसान इनका विरोध कर रहे थे। पंजाब में भाजपा के नेताओं को प्रचार तो दूर, कोई मीटिंग तक नहीं करने दी जा रही थी। ऐसे में यह जरूरी था कि कानून रद्द हों, क्योंकि इसके बगैर भाजपा को बड़ा सियासी नुकसान होना तय था, जिसका इंपैक्ट देश के दूसरे राज्यों के चुनाव में भी होना था। अब भाजपा के लिए राह आसान हो सकती है। खासकर, इसलिए भी कि पंजाब में भाजपा अकेले चुनावी मैदान में उतर रही है। वहीं 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले पंजाब चुनाव के फैसले से कोई विरोधी संदेश निकल सकता था।
2. जीत के लिए जरूरी किसान वोट बैंक सधेगा
पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से 40 अर्बन, 51 सेमी अर्बन और 26 रूरल सीट हैं। रूरल के साथ सेमी अर्बन विधानसभा सीटों पर किसानों का वोट बैंक हार-जीत का फैसला करता है। ऐसे में पंजाब चुनाव से पहले भाजपा के लिए कानून वापस करना फायदेमंद साबित हो सकता है।
3. फैसले की टाइमिंग सिख बहुल सीटों पर असर डालेगी
पंजाब मालवा, माझा और दोआबा एरिया में बंटा हुआ है। सबसे ज्यादा 69 सीटें मालवा में हैं। मालवा में ज्यादातर रूरल सीटें हैं, जहां किसानों का दबदबा है। यही इलाका पंजाब की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाता है। 23 सीट वाले दोआबा में ज्यादातर दलित असर वाली सीटें हैं। 25 सीटों वाले माझा में सिख बहुल सीटें हैं। गुरुपर्व पर लिए गए फैसले से भाजपा के आगे सिखों से भावनात्मक रूप से जुड़ने की राह खुलेगी। ये वोट पाले में आए तो भाजपा के लिए प्लस पॉइंट होगा।
पंजाब में किसान मजबूत, क्योंकि 75% आबादी खेती से जुड़ी
पंजाब की इकॉनॉमी एग्रीकल्चर पर आधारित है। खेती होती है तो उससे न केवल बाजार चलता है, बल्कि ज्यादातर इंडस्ट्रीज भी ट्रैक्टर से लेकर खेतीबाड़ी का सामान बनाती हैं। पंजाब में 75% लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर खेती से जुड़े हैं। प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोगों की बात करें तो इसमें किसान, उनके खेतों में काम करने वाले मजदूर, उनसे फसल खरीदने वाले आढ़ती और खाद-कीटनाशक के व्यापारी शामिल हैं।
इनके साथ ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री भी जुड़ जाती है। आढ़तियों से फसल खरीदकर आगे सप्लाई करने वाले ट्रेडर्स और एजेंसियां भी खेती से ही जुड़ी हुई हैं। अगले फेज में शहर से लेकर गांव के दुकानदार भी किसानों से ही जुड़े हैं। फसल अच्छी होती है, तो फिर किसान खर्च भी करता है। इसके जरिए कई छोटे कारोबार भी चलते रहते हैं।
बैकफुट पर शिरोमणि अकाली दल बादल:नए कृषि कानूनों पर टूटे गठजोड़ के बाद पंजाब में कैप्टन लेंगे बादल की जगह, ग्रामीण वोट बैंक संभालेंगे
कृषि कानून वापस लेने का फैसला नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने ले लिया है। इस फैसले के बाद पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल बादल (SAD) फिर से बैकफुट आ गया। अब अकाली दल की जगह कैप्टन अमरिंदर सिंह ले सकते हैं और इन मुद्दों पर छिटके वोट बैंक को अपने पक्ष में एकजुट कर सकते हैं। कैप्टन ने भाजपा के साथ जाने का खुलकर ऐलान भी कर दिया है।
पंजाब के चुनावी परिदृश्य को देखकर SAD ने कृषि कानूनों को आधार बनाकर भाजपा से गठजोड़ तोड़ लिया था। वहीं बेदअबी के मुद्दे पर भी शिरोमणि अकाली दल पहले से गांवों में अपनी जमीन तलाश रहा है। ऐसे में भाजपा के कृषि कानून वापस लेने फैसले के बाद पंजाब की राजनीति में उफान आना लाजिमी है। क्योंकि इस फैसले से भाजपा सहानुभूति का वोट हासिल करने का प्रयास करेगी। पहले इस वोट बैंक को संभालने के लिए SAD भाजपा के साथ था। गठबंधन टूटने के बाद अब SAD फिर से बैकफुट पर है। क्योंकि पहले से तय था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह कृषि कानून वापस करवाने के लिए गृह मंत्री अमित शाह के साथ काम कर रहे थे।
1996 में हुआ गठबंधन, सितंबर 2020 में टूटा
शिरोमणि अकाली दल बादल ने 1996 में बहुजन समाज पार्टी से अपना गठबंधन तोड़कर भारतीय जनता पार्टी के साथ आ गए थे। तब से वह भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ते आ रहे थे। सितंबर 2020 में अकाली दल ने इसे तोड़ दिया था और वह फिर से बसपा के साथ आ गए थे। शिरोमणि अकाली दल ने बसपा के साथ सीट शेयरिंग भी कर ली है और टिकटों को ऐलान भी हो चुका है।
वापस आना मुश्किल, सुलह की गुंजाइश नहीं
शिरोमणि अकाली दल बादल को लग रहा था कि भाजपा कभी कृषि कानून वापस नहीं लेगी, इसलिए SAD ने छह माह पहले ही चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था। कभी भी भाजपा के साथ आने से मना कर दिया था। अब अकाली दल बेहद आगे निकल चुका है और भाजपा से सुलह होनी बेहद मुश्किल है। कैप्टन ने कांग्रेस से विवाद के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बेहद कुशलता से इस मौके को कैप्चर किया और भाजपा से हाथ मिलाया है।
शहरी वोट बैंक संभालने में लगा है अकाली दल
ग्रामीण वोट बैंक हाथ से जाता देख सुखबीर सिंह बादल ने अपने प्रोग्राम बदल लिए थे। वह अब पूरी तरह से शहरी वोट बैंक को अपने हाथ में करने में लगे हुए हैं। गांवों में उनका जबरदस्त विरोध भी हो रहा है। अब जब कृषि कानून वापस हो रहे हैं तो देखना होगा कि अकाली दल गांवों में किस ढंग से अपना प्रचार शुरू करता है।






