खेल नगरी के रूप में मशहूर जालंधर का खेल उद्योग दो दशक से मंदी की मार से जूझ रहा है। सरकारें आईं और गईं मगर इस उद्योग के अच्छे दिन नहीं आए। बड़े-बड़े उद्योगों के अलावा थोड़ा बहुत काम करने वाले कारोबारियों ने तो खुद को संभाल लिया, लेकिन छोटे उद्योग मंदी को सह नहीं सके और धीरे धीरे इनमें तालाबंदी होने लगी। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे इन छोटे उद्योगों की कमर कोरोना ने तोड़ दी। आलम यह है कि दो दशक पहले जो खेल उद्योग 3,000 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार करता, वर्तमान में 1,900 करोड़ रुपये तक सिमट चुका है।जालंधर में करीब 2,700 छोटी-बड़ी खेल इकाइयां हैं। शहर की सबसे मशहूर बस्ती नौ स्पोर्ट्स मार्केट में ही क्रिकेट बैट, लेदर बॉल, बैडमिंटन रैकेट, शटलकॉक इत्यादि का बड़े पैमाने पर कारोबार होता था। अब यह उद्योग काफी हद तक बंद हो चुके हैं। वहीं, कोरोना कॉल के दौरान कई कारोबारी आर्थिक संकट में दब गए, जिससे उन्हें अपने कारोबार बंद करने पड़े।
दानिशमंदा इलाके, भार्गव कैंप और बस्ती नौ स्पोर्ट्स मार्केट के आसपास लगते इलाकों में छोटी जगहों पर भी यह काम बहुतायत में होता था, जो अब बंद हो चुका है। इसकी वजह है स्किल लेबर की कमी। असर यह हुआ कि लेदर बॉल उद्योग मेरठ स्थानांतरित हो गया है। जबकि क्रिकेट बैट उद्योग जम्मू-कश्मीर के कठुआ में। कई अन्य कारखाने भी पंजाब को छोड़कर पड़ोसी राज्यों में शिफ्ट हो रहे हैं।
ओलंपिक एवं एशियन गेम्स से लेकर आईपीएल टीमों को खेल सामान की सप्लाई
जालंधर खेल उद्योग में तैयार सामान ओलंपिक, एशियन, कॉमनवेल्थ गेम्स इत्यादि के अलावा हर तरह के क्रिकेट टूर्नामेंट व आईपीएल टीमों को सप्लाई होता है। तमाम खेलों के इंटरनेशनल खिलाड़ी यहां के उद्योग से ही खेल सामान को बनवाते हैं। क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर, एमएस धोनी, हरभजन सिंह, क्रिस गेल, विराट कोहली के अलावा भारतीय पुरुष हॉकी टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह, वरुण कुमार, हार्दिक सिंह यहां के बने खेल सामान ही इस्तेमाल करते हैं। वहीं, बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु, साइना नेहवाल की तरह कितने ही राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय खिलाड़ी जालंधर के खेल सामान को वरीयता देते हैं।
खेल उद्योग को नहीं मिला स्किल व आरएंडडी सेंटर
जालंधर के खेल उद्योग को स्किल सेंटर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) सेंटर न मिलने के कारण भी नुकसान झेलना पड़ रहा है। समय-समय की सरकारें भी खेल उद्योग के साथ दो दशक से सिर्फ ‘खेल’ ही कर रही हैं। सेंटर खोलने की मांग को लेकर खेल उद्यमी सरकार के प्रतिनिधियों से भी कई बार मिल चुके हैं, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने न तो उद्योग की सुध ली और न ही स्किल सेंटर का निर्माण करवाया। सरकारी नीतियों के कारण ही हजारों उत्पादक अब ट्रेडिंग के कारोबार में बदल चुके हैं।
कठुआ शिफ्ट हो चुकी है बैट इंडस्ट्री
जम्मू-कश्मीर से कश्मीरी विलो की लकड़ी पर पंजाब में पाबंदी है। इस कारण जालंधर की बैट इंडस्ट्री अब कठुआ में स्थानांतरित हो गई है। करीब दस वर्ष पहले जालंधर में 350 बैट बनाने वाली यूनिट थी, लेकिन अब सिर्फ करीब 80 यूनिट बची हैं। बैट तैयार करने के लिए कच्चा माल जैसे बैट का हैंडल, धागा, ग्रिप, स्टिकर इत्यादि जालंधर से कठुआ जाता है और वहां से बैट तैयार होकर यहां आता है। अभी तक पंजाब सरकार कश्मीरी विलो से बैन नहीं हटा पाई है। वहीं, जालंधर की 80 फीसदी बैट इंडस्ट्री भी यहां बैट पर हैंडल लगाने का काम ही कर रही हैं।
फुटबॉल सिलने, बैडमिंटन बुनने और शटलकॉक बनाने वालों की कम हुई तादाद
अब फुटबाल सिलने, बैडमिंटन रैकेट बुनने और शटलकॉक बनाने वाले परिवारों की तादाद बहुत कम हो गई है। घरों में होने वाले इस काम को कई परिवारों ने छोड़ दिया है। कारण है कि इन लोगों की हालत लॉकडाउन से पतली हो गई थी और सरकार ने भी इन लोगों के लिए किसी प्रकार की रियायत देने की घोषणा नहीं की। यही वजह है फुटबॉल और बैडमिंटन की लेबर धीरे-धीरे अपना काम छोड़ रही है। वहीं, फुटबॉल और बैडमिंटन बनाने वाली कई इकाइयां बंद हो गई हैं। वहीं शटलकॉक इंडस्ट्री को बतख के पंख पर लगे बैन के कारण भी मुसीबत का सामना करना पड़ा था। अब यहां पर मुर्गी के पंखों की ही शटलकॉक ही बनाई जाती हैं।
बिना सरकारी राहत के दम तोड़ देगी घरेलू इंडस्ट्री: रविंदर धीर
खेल उद्योग संघ, पंजाब के कन्वीनर रविंदर धीर ने कहा कि खेल सामान बनाने वाली घरेलू इंडस्ट्री को लगातार नजरअंदाज ही किया गया है। सैकड़ों परिवारों को रोटी देने वाली घरेलू इंडस्ट्री तमाम तरह के बिल भी देती है। ब्याज के साथ ऋण की वापसी भी करती है और उसे राहत फिर भी नहीं मिल पाती। अगर पंजाब सरकार ने रवैया नहीं बदला तो घरेलू इंडस्ट्री दम तोड़ देगी। पंजाब में बनने वाली नई सरकार से मांग है कि घरेलू इंडस्ट्री के लिए सस्ती बिजली एवं ऋण में रियायत वाले पैकेज की घोषणा जरूर करें।
स्किल सेंटर न होने से बैट एवं लेदर बॉल इंडस्ट्री हुई स्थानांतरित: संजय कोहली
स्पोर्ट्स एंड टॉय एसोसिएशन के चेयरमैन संजय कोहली ने कहा कि आरएंडडी सेंटर व स्किल सेंटर न होने से बैट एवं लेदर बॉल इंडस्ट्री दूसरे राज्यों में शिफ्ट हो गई। जालंधर की इंडस्ट्री विश्व भर में खेल सामान निर्यात करती है, लेकिन लेबर की सही ट्रेनिंग न होने से लेदर बॉल इंडस्ट्री अब मेरठ में शिफ्ट हो गई। शहर में स्किल सेंटर होगा तो क्वालिटी के उत्पाद तैयार होंगे और स्किल लेबर तैयार होगी। पंजाब में किसी भी पार्टी की सरकार बने, लेकिन खेल इंडस्ट्री की तरफ ध्यान देना जरूरी है। खेल इंडस्ट्री को प्रफुल्लित करने के लिए सरकार से प्रोत्साहन राशि मिलनी चाहिए।