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पंजाब में बिखरे दलितों पर जट्‌ट सिखों का राज:सूबे से दलित राजनीति शुरू करने वाले कांशीराम भी नहीं कर पाए एकजुट, बसपा-शिअद के लिए राह नहीं आसान

पंजाब में विधानसभा चुनाव 2022 के लिए विभिन्न वर्गों में बंटे वोट बैंक को साधने की तिकड़म भी शुरू हो चुकी हैं। राजनीतिक दल हर वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए पासे फेंक रहे हैं। इन सब के बीच सभी राजनीतिक पार्टियां सूबे में 32 प्रतिशत आबादी वाले दलित वर्ग पर नजर गड़ाए हैं।

राजनेता प्रदेश के इस बड़े वर्ग का वोट बैंक हथियाने के लिए कभी इनसे जुड़े डेरों पर शीश नवा रहे हैं तो कुछ सत्ता में आने पर इनके उत्थान के लिए योजनाओं का पिटारा खोलने का दावा कर रहे हैं। लेकिन इतिहास रहा है कि यह वर्ग आज तक एकजुट होकर किसी एक के समर्थन में नहीं निकला। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि पंजाब में दलित वर्ग को एकजुट करने के लिए निकले कांशी राम हार मानकर उत्तर प्रदेश चले गए थे।

सबसे ज्यादा दलित आबादी पंजाब में है

देश में सबसे ज्यादा दलित आबादी वाला प्रदेश पंजाब है। इसके बाद हिमाचल प्रदेश का नंबर है। सूबे की खूबसूरती यही है कि यहां सिख, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई वर्ग के लोग रहते हैं। धर्म और जाति को लेकर कोई बड़ा दंगा फसाद नहीं हुआ है। यही वजह है कि राजनीतिक दल बेशक आंकड़ों के अनुसार, जाति-धर्मों के लोगों का वर्गीकरण कर रहे हैं, लेकिन लोग एकजुट होकर कभी एक दल के समर्थन में नहीं उतरे।

32 प्रतिशत दलित आबादी, फिर भी ‘जट्ट राज’

पंजाब में जट्‌ट सिखों की आबादी मात्र 25 फीसदी, दलित आबादी 32 फीसदी है। अनुसूचित जातियों में सबसे बड़ा वर्ग 26.33 प्रतिशत मज़हबी सिखों का है। रामदासिया समाज की आबादी 20.73 प्रतिशत है। आदी धर्मियों की आबादी 10.17 और वाल्मीकियों की आबादी 8.66 है।

32 प्रतिशत दलित आबादी के बावजूद पंजाब की राजनीति में जट्‌ट सिखों का ही दबदबा रहा है। दलित सत्ता पर काबिज ही नहीं हो पाए हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी बंटी हुई है, विशेषकर सिख दलित और हिंदू दलित वर्ग के बीच।

इन दो मुख्य वर्गों का भी आगे कई समुदायों में बिखराव है, जो अपनी अलग-अलग विचारधारा रखते हैं। मजहबी सिख और वाल्मीकि इन दोनों समाज के लोगों ने हमेशा खुद को बहुजन समाज पार्टी से अलग ही रखा।

कांशी राम ने किया था एकजुट करने का प्रयास

पंजाब में कांशी राम ने सबसे पहले इन सभी वर्गों को एकजुट करने का प्रयास किया, लेकिन सभी की अलग विचारधारा के कारण वे सफल नहीं हो पाए। न ही सूबे में बहुजन समाज पार्टी को दलित वर्ग की राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापित कर पाए। इसलिए उन्होंने पंजाब से निकलकर उत्तर प्रदेश और देश के अन्य इलाकों में दलित वर्ग के बीच काम शुरू किया। विभिन्न दलित वर्गों के बीच सामंजस्य और गठजोड़ बनाने की कोशिश की। यही वजह थी कि उत्तर प्रदेश में उनकी उत्तराधिकारी मायावती को अभूतपूर्व कामयाबी मिली।

1992 में मिला साथ, फिर सिमट गया वोट प्रतिशत

कांशीराम ने पंजाब में दलितों को एकजुट करने के लिए बहुत मेहनत की। उनमें राजनीतिक जागरुकता फैलाने के लिए भी पहल की। कांशीराम ने सक्रिय रूप से 1984 में अपना अभियान शुरू कर दिया था। 1992 में उन्हें अच्छा रिस्पॉन्स मिला। बसपा को 9 सीटें मिलीं और 16 प्रतिशत वोट भी मिले। उसके बाद 1996 में बसपा के दम पर शिरोमणि अकाली दल तो सत्ता में आ गया, लेकिन खुद बसपा को सिर्फ एक ही सीट मिली।

1997 लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 7.5% प्रतिशत वोट ही मिल पाए, जो वर्ष 2017 विधानसभा चुनावों में सिमटकर 1.5% पर आ गए। हालत यह है कि पार्टी सिर्फ दोआबा के ही कुछ हिस्सों तक सीमित हो गई है। दोआबा पंजाब का ऐसा अकेला क्षेत्र है जहां प्रदेश में सबसे ज्यादा 42 प्रतिशत दलित आबादी है, इसके बावजूद यहां पर बसपा कुछ खास प्रभावी नहीं है।

कांशीराम के नाम पर बसपा का दांव

बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने नवांशहर रैली में कांशीराम के नाम पर इमोशनल कार्ड खेला। उन्होंने पंजाब में दलितों की एकजुटता न होने की बात कही। मायावती ने कहा कि बाबा कांशीराम पंजाब से काफी निराश और नाराज थे। यहीं से उन्होंने दलितों, दबे कुचलों और शोषित वर्ग के लिए आवाज बुलंद की और इसी स्टेट में उन्हें कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला। इसी तनाव में वह बीमार रहने लगे थे।

मायावती ने इमोशनल कार्ड खेलकर लोगों को संगठित करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि उनके जीते जी न सही लेकिन बसपा और अकाली दल का साथ देकर कांशीराम को श्रद्धांजलि दें। मायावती की यह अपील क्या रंग दिखाती है यह तो मतदान के बाद ही पता चलेगा।

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