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चुनाव में ऐसा भी होता है कभी-कभी:2007 में 3% वोट ज्यादा, लेकिन सीटों में पिछड़ गई कांग्रेस, 1992 में 43.83% वोट शेयर का रिकॉर्ड बरकरार

अक्सर ज्यादा वोट हासिल करने वाली पार्टी ही ज्यादा सीट जीतती है लेकिन पंजाब में एक चुनाव ऐसा भी रहा, जब अधिक वोट हासिल करके भी पार्टी सीटों में पिछड़ गई। ऐसा 2007 के चुनाव में तब हुआ जब कांग्रेस 40.90 प्रतिशत वोट हासिल करके भी 44 सीटें जीत सकी थी। विपक्षी शिरोमणि अकाली दल ने 37.09 प्रतिशत वोट लेकर 48 सीटें जीत ली थीं।

शिअद से उस वक्त गठबंधन में भाजपा भी 19 सीटों पर कब्जा करने में सफल रही थी। दोनों दलों ने मिलकर बहुमत का आंकड़ा पार किया और कांग्रेस से सत्ता छीन ली थी। रोचक पहलू यह भी है कि 1992 के चुनाव में कांग्रेस ने 43.83 प्रतिशत वोट शेयर का जो रिकॉर्ड बनाया था, वो आज तक कायम है। 1992 में कांग्रेस ने 117 में 87 सीटों पर कब्जा जमाया था। यह रिकॉर्ड 30 सालों से नहीं टूटा है।

जब ज्यादा वोट लेकर भी सीटों में पिछड़ शिअद से पिछड़ गई थी कांग्रेस

सूबे में 2002 में कांग्रेस ने 35.38% वोट के साथ 62 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह सीएम बने। पांच साल बाद 2007 में पार्टी के वोट बढ़े लेकिन सीटें कम जीत पाई। कांग्रेस के वोटों में 5% की वृद्धि हुई थी। उसके हाथ 44 सीटें ही आईं। वहीं, शिअद को 37.09% वोट मिले और उसने कांग्रेस से चार सीटें ज्यादा जीतीं। भाजपा से गठबंधन था तो 19 सीटें उसके खाते में भी गई। प्रकाश सिंह बादल एक बार फिर कांग्रेस से सत्ता छीनकर सीएम बनने में सफल रहे।

30 साल से रिकॉर्ड है बरकरार

1985 में राज्य में 38% वोट लेकर 73 सीटें जीतने वाले शिअद ने सरकार बनाई थी। इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन भी रहा। जब 1992 में विधानसभा के चुनाव हुए तो वोट हासिल करने का एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जो आगे नहीं टूट पाया। उस वक्त कांग्रेस ने धमाकेदार वापसी करते हुए न केवल 43.83% वोट हासिल किए बल्कि 87 सीटों पर भी कब्जा किया।

पंजाब के 4 दिग्गज नेता ऐसे भी:ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति, बराड़, बरनाला, डॉ. सच्चर सीएम बनने के साथ ही दूसरे राज्यों के राज्यपाल भी रहे

पंजाब के 4 दिग्गज नेता ऐसे भी हैं, जिन्होंने एक बार बतौर मुख्यमंत्री बन कर सूबे की सेवा की और बाद में वे देश के कई संवैधानिक पदों पर भी पहुंचे। इनमें मुख्य नाम ज्ञानी जैल सिंह का है।

ज्ञानी जैल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री रहने के साथ-साथ देश के राष्ट्रपति भी बने। इसके अलावा हरचरण सिंह बराड़, सुरजीत सिंह बरनाला, डॉ. भीम सेन सच्चर भी पंजाब के मुख्यमंत्री के साथ-साथ अलगअलग राज्यों के राज्यपाल बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। हालांकि, पंजाब में कैरों व बादल दोनों दिग्गज मुख्यमंत्री माने जाते है, लेकिन वह पंजाब की राजनीति में ही ज्यादातर सरगर्म हैं।

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